भारत को त्योहारों की भूमि कहा जाता है, जहाँ हर पर्व प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और मानव जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ होता है। मकर संक्रांति ऐसा ही एक विशेष और पवित्र पर्व है, जिसे हर वर्ष 14 जनवरी को पूरे भारत में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी, बुधवार को पड़ेगी और यह दिन धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
यह पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों, विद्यार्थियों, परिवारों और समाज के हर वर्ग से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, सकारात्मक सोच और नई शुरुआत का संदेश देती है।
मकर संक्रांति क्या है?
मकर संक्रांति वह दिन होता है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य का यह गोचर अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी दिन से सूर्य की गति दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाती है, जिसे सकारात्मक ऊर्जा, शुभ समय और उन्नति का प्रतीक माना गया है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति उन गिने-चुने त्योहारों में से एक है, जो हर साल एक ही तारीख (14 जनवरी) को मनाया जाता है। यह विशेषता इसे अन्य त्योहारों से अलग बनाती है, क्योंकि अधिकांश पर्व चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं।
मकर संक्रांति 2026: तिथि और धार्मिक महत्व
- 📅 तिथि: 14 जनवरी 2026
- ☀️ सूर्य संक्रमण: मकर राशि में प्रवेश
- 🙏 पुण्य काल: सुबह से दोपहर तक (स्थानीय पंचांग अनुसार)
इस दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया स्नान, दान और जप जीवन के पापों को नष्ट करता है और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व (विस्तार से)
हिंदू धर्म में मकर संक्रांति को अत्यंत पवित्र और फलदायी पर्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन देवता भी पृथ्वी पर वास करते हैं। इसी कारण से इस दिन:
- गंगा, यमुना, नर्मदा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है
- सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है
- ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान दिया जाता है
मान्यता है कि मकर संक्रांति पर किया गया दान सौ गुना फल देता है, इसलिए लोग इस दिन उदारतापूर्वक दान करते हैं।
सूर्य, पृथ्वी और ब्रह्मांडीय संतुलन
मकर संक्रांति के समय सूर्य, पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच एक विशेष ऊर्जात्मक संतुलन बनता है। इस अवधि में सूर्य की किरणें पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर अधिक सीधी पड़ती हैं, जिससे:
- प्राकृतिक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है
- वातावरण में सकारात्मकता आती है
- मानव शरीर और मन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है
आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि सूर्य की स्थिति में परिवर्तन से जलवायु, जैविक घड़ियाँ (Biological Clock) और मानसिक स्थिति प्रभावित होती है। इसी वैज्ञानिक सत्य को भारतीय ऋषियों ने प्राचीन काल में आध्यात्मिक भाषा में समझाया था।
ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मानव शरीर
भारतीय योग और आयुर्वेद के अनुसार, मानव शरीर केवल मांस और हड्डियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा का एक जीवंत केंद्र है। मकर संक्रांति के समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह शरीर के भीतर अधिक सहज रूप से प्रवेश कर सकता है।
इस समय:
- ध्यान (Meditation)
- प्राणायाम
- सूर्य नमस्कार
करना विशेष लाभकारी माना जाता है, क्योंकि शरीर और ब्रह्मांड की ऊर्जा एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में होती हैं। यही कारण है कि प्राचीन काल में इस समय को आत्मिक उन्नति के लिए उपयुक्त माना गया।
मकर संक्रांति और गंगा स्नान का गहरा संबंध
मकर संक्रांति का गंगा स्नान से अत्यंत गहरा और पवित्र संबंध माना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी में स्नान करने से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और आत्मा शुद्ध होती है। यही कारण है कि इस दिन देश के विभिन्न भागों से लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों के तटों पर एकत्रित होते हैं।
विशेष रूप से माना जाता है कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब गंगा जल में अद्भुत दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। इस समय किया गया स्नान केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है। इसी विश्वास के कारण मकर संक्रांति पर गंगा स्नान को अत्यंत पुण्यकारी कहा गया है।
प्रयागराज और मकर संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व
उत्तर प्रदेश स्थित प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष महत्व रखता है। यहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम, जिसे त्रिवेणी संगम कहा जाता है, हिंदू धर्म का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के बाद पहला यज्ञ यहीं प्रयागराज में किया था। इसी कारण इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। मकर संक्रांति के दिन यहाँ स्नान करने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
मकर संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण भी हैं। इस दिन के बाद सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अधिक सीधी पड़ने लगती हैं, जिससे:
- दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं
- रातें छोटी होने लगती हैं
- ठंड की तीव्रता कम होने लगती है
वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। सूर्य की रोशनी से शरीर में विटामिन-D का स्तर बढ़ता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
मकर संक्रांति और ऋतु परिवर्तन का संबंध
मकर संक्रांति शीत ऋतु के अंतिम चरण और वसंत ऋतु की शुरुआत का संकेत देती है। यह समय किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दौरान नई फसल घर आती है।
किसान अपनी मेहनत का फल पाकर ईश्वर और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इसी कारण मकर संक्रांति को फसल उत्सव भी कहा जाता है और पूरे भारत में इसे कृषि से जुड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
भारत में मकर संक्रांति के विभिन्न नाम और परंपराएँ
भारत की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अलग-अलग राज्यों में यह पर्व अलग नामों और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।
🌾 तमिलनाडु में पोंगल (विस्तार से)
तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल कहा जाता है और यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। पोंगल तमिल संस्कृति का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है।
चार दिन इस प्रकार हैं:
- भोगी पोंगल – पुराने सामान को त्यागने का दिन
- सूर्य पोंगल – सूर्य देव को समर्पित
- मट्टू पोंगल – पशुओं का सम्मान
- कानूम पोंगल – पारिवारिक मिलन
इस दौरान दूध, चावल और गुड़ से बना विशेष व्यंजन पोंगल बनाया जाता है।
🪁 गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण
गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति को उत्तरायण कहा जाता है। इस दिन पूरा आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। लोग छतों पर इकट्ठा होकर पतंग उड़ाते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं।
यह पर्व सामूहिक आनंद, प्रतिस्पर्धा और भाईचारे का प्रतीक है। इस अवसर पर तिल के लड्डू, चिक्की और मिठाइयाँ बनाई जाती हैं।
🔥 पंजाब में लोहड़ी
पंजाब में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। यह भी फसल कटाई से जुड़ा पर्व है। लोग अलाव जलाकर उसके चारों ओर नाच-गाना करते हैं।
लोहड़ी में:
- मूंगफली
- रेवड़ी
- तिल और गुड़
अग्नि को अर्पित किए जाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
🌾 असम में माघ बिहू
असम में मकर संक्रांति को माघ बिहू कहा जाता है। यह सामूहिक भोज, लोक नृत्य और पारंपरिक खेलों के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सामुदायिक एकता को मजबूत करता है।
🍲 उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व
उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। इस दिन खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है और दान किया जाता है।
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ खाने की परंपरा सदियों पुरानी है। आयुर्वेद के अनुसार:
- तिल शरीर को गर्मी प्रदान करता है
- गुड़ पाचन तंत्र को मजबूत करता है
- दोनों मिलकर ऊर्जा प्रदान करते हैं
साथ ही यह परंपरा हमें मधुर वाणी और आपसी प्रेम का संदेश देती है।
मकर संक्रांति पर दान का महत्व
इस दिन दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करते हैं जैसे:
- कंबल
- तिल-गुड़
- अनाज
- वस्त्र
दान से समाज में समानता और सहयोग की भावना बढ़ती है।
मकर संक्रांति का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
मकर संक्रांति समाज को जोड़ने वाला पर्व है। यह पर्व हमें:
- आपसी प्रेम
- भाईचारा
- सेवा भावना
का महत्व समझाता है। लोग पुराने मतभेद भूलकर एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं।
मकर संक्रांति 2026 का संदेश
मकर संक्रांति 2026 हमें यह सिखाती है कि जीवन में बदलाव आवश्यक है। जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी नकारात्मकता छोड़कर सकारात्मक मार्ग अपनाना चाहिए।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति 2026, जो 14 जनवरी को मनाई जाएगी, एक ऐसा पर्व है जो धर्म, विज्ञान, कृषि और संस्कृति को एक साथ जोड़ता है। यह पर्व हमें स्वास्थ्य, समृद्धि और सद्भावना का संदेश देता है।
भारत की विविधता और एकता इस पर्व में सुंदर रूप से दिखाई देती है। मकर संक्रांति वास्तव में नई शुरुआत और आशा का पर्व है।

