15 अगस्त
स्वतंत्रता दिवस पर भाषण
सभी आदरणीय अतिथिगण, सम्मानित प्रधानाचार्य जी, शिक्षकगण एवं मेरे प्रिय साथियों, आप सभी को मेरा सादर नमस्कार।
आज हम सभी यहाँ अपने देश के 79वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर एकत्रित हुए हैं। 15 अगस्त 1947 का दिन भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब हमारे देश ने वर्षों की गुलामी के बाद आज़ादी प्राप्त की।
यह स्वतंत्रता हमें यूँ ही नहीं मिली। इसके लिए लाखों वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के साहस, त्याग और संघर्ष के कारण आज हम स्वतंत्र भारत में खुली हवा में साँस ले रहे हैं।
लेकिन स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। हमें अपने देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए, पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और समाज में प्रेम, भाईचारे तथा एकता की भावना बनाए रखनी चाहिए।
हम छात्र देश का भविष्य हैं। यदि हम आज अच्छी शिक्षा, अनुशासन, मेहनत और अच्छे संस्कार अपनाएँगे, तो कल भारत को और भी मजबूत, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बना सकेंगे।
आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम अपने देश की प्रगति में अपना योगदान देंगे और हमेशा अपने राष्ट्र का सम्मान करेंगे।
अंत में, मैं अपनी वाणी को इन शब्दों के साथ विराम देता हूँ—
सोचा था मैंने राम सा जीवन बिताने को,
लेकिन लोगों ने वीवस किया परशुराम सा फरसा उठाने को।
सोचा था देश को निर्मल जल सा पवित्र बनानेको,
पर आबैठे फंगस इसमें अपना घर बसाने को।
हा हमें पता है कि “जल ही जीवन है।”
परन्तु डाला डेरा बनाया जाल फैला के सोए कवक सैवल,
जब तक ना हटे कवक सैवल कैसे चाखु निर्मल जल का स्वाद।
ये है मेरे देश का हाल, आजादी के होग्ये ७२ साल।
जब जाना मैने देश का हाल, मन में उठे लाखो सवाल।
तब मैने मन को खंगाला जो था त्थय तब उस पहचाना।
तब मन ने बोला मुझको अब तक था तू दीप अब ज्वाला बन जा, अब है तेरी जरूरत अब रखवाला बन जा।
ले खुद से यह प्रण निर्मल जल सा देश को बनायेको।
अब रख राम को मन मे, मन को सीतल बनानेको,
ले हाथों में परशुराम का फरासा देश से नाफरत (अत्याचार) मिटानेको।
अब बना तू अपनी नई पहचान दिखादे दुनिया को की तुझमें भी है जान।
भगवान नहीं कहीं वह हमारे दिल में बैठे बनाके घर,
जिसने खुद को पहचाना उसने भगवान को जाना।
– हरीनारायण सिंह
“सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।”
जय हिन्द!
वन्दे मातरम्!
