Class 10 Social Science Chapter 5 भारत : विज्ञान और टेक्नोलॉजी की विरासत

भारत : विज्ञान और टेक्नोलॉजी की विरासत Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए:

પ્રશ્ન 1.
प्राचीन भारत का धातु विद्या में योगदान समझाइए ।
उत्तर:
प्रस्तावना: प्राचीन भारत में हमारे महान ऋषियों ने विज्ञान के क्षेत्र में अमूल्य विरासत विश्व को दी है, जो हमारे लिए गौरव की बात है ।
धातुविद्या:

  • प्राचीन काल से ही भारत के लोग धातुविद्या को अपने व्यवहारिक जीवन में उपयोग करते है ।
  • प्राचीन भारत में धातुविद्या के क्षेत्र में अद्वितीय सिद्धियाँ प्राप्त की थी । उदाहरण स्वरूप में सिंधुघाटी से प्राप्त धातु की नर्तकी की प्रतिमा, तक्षशिला से प्राप्त हुई ।
  • कुषाण राजाओं के समय की भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ, चोल राजाओं के समय तैयार हुई धातु शिल्प, चैन्नई के संग्रहालय में रखी गयी अंतरराष्ट्रीय प्राप्त नृत्यकला का उत्कृष्ट नमूना महादेव नटराज का शिल्प है ।
  • एक अन्य शिल्प धनुर्धारी श्रीराम का शिल्प भी चैन्नई के संग्रहालय में रखा गया है ।
  • इसके अलावा कलात्मक देवी-देवता, पशु-पक्षी तथा सुपारी काटने की सरौंतियाँ आदि बनाई जाती थी । ये सभी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है ।
  • इन धातुओं को बनाने की परंपरा दसवी से ग्यारहवी सदी में शुरू हुई थी ।

પ્રશ્ન 2.
प्राचीन भारत में रसायनविद्या में साधी गयी प्रगति का वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
प्रस्तावना: भारत के बारे में पश्चिमी देशों की आलोचना थी की वह धर्म और तत्त्वचिंतन में डूबा हुआ देश है । उसके पास आध्यात्मिक और रूढ़िगत दृष्टिकोण है परंतु वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव है । आधुनिक संशोधनों के पश्चात् सिद्ध हो गया है और पूर्व आलोचक भी स्वीकारने लगे हैं कि गणितशास्त्र, खगोलशास्त्र, वैदिक विद्या, रसायनशास्त्र, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र आदि में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति करके अमूल्य विरासत विश्व को प्रदान की है ।

रसायन विद्या:

  • रसायन एक प्रयोगात्मक विज्ञान है । यह विद्या विभिन्न खनिजों, वृक्षों, कृषि, खनिजों, विविध धातु के निर्माण और उसमें परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक औषधियों के निर्माण में उपयोगी है ।
  • रसायनशास्त्रियों में नालंदा विद्यापीठ के आचार्य नागार्जुन को भारतीय रसायनशास्त्र के आचार्य माना जाता है ।
  • नागार्जुन ने ‘रसरत्नाकर’ और ‘स्वास्थ्यमंजरी’ जैसी पुस्तके लिखी थी ।
  • आचार्य नागार्जुन ने वनस्पति औषधि के साथ रसायन औषधी के उपयोग का परामर्श दिया था ।
  • पारे की भस्म बनाकर औषधि के रूप में उपयोग का प्रयोग नागार्जुन ने शुरू किया था ।
  • नालंदा विद्यापीठ में रसायनविद्या के अध्ययन और संशोधन के लिए अपनी अलग रसायनशाला और भट्ठियाँ थी।
  • रसायनशास्त्रों के ग्रन्थों में मुखरस, उपरस, दस प्रकार के विष, विविध प्रकार के क्षारों और धातुओं की भस्म का वर्णन है ।
  • रसायनविद्या की पराकाष्ठा भगवान बुद्ध की धातु शिल्प से दृष्टिगोचर होती है ।
  • बिहार के सुल्तानगंज में भगवान बुद्ध की 7 1/2 फूट ऊँची और 1 टन वजन की ताम्रमूर्ति प्राप्त हुई है ।
  • नालंदा से बुद्ध की 18 फूट ऊँची ताम्रमूर्ति प्राप्त हुई है ।

7 टन वजन और 24 फूट ऊँचा सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमाद्वितीय) द्वारा बनाया गया विजय स्तंभ अभी तक वर्षा, धूप, छाँव के उपरांत अभी तक काट (जंग) नहीं लगा है । यह भारतीय रसायनविद्या का उत्तम नमूना है । निष्कर्ष: प्राचीन भारत के विज्ञान का ज्ञान विश्व में स्वीकार्य हुआ है । हमारी संस्कृति विशाल और वैविध्यपूर्ण है । उसमें धर्म और विज्ञान, परंपरागत आदर्शों, व्यवहारिक ज्ञान और समाज का सुमेल समन्वय हुआ है, जो विश्व के अधिकांश देशों में कम है ।

પ્રશ્ન 3.
वैदिक विद्या और शैल्य चिकित्सा का प्राचीन भारत में महत्त्व समझाइए ।
उत्तर:
प्रस्तावना: प्राचीन समय में भारत ने वैदिक विद्या और शैल्य चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व सिद्धि प्राप्त की थी । भारतीय वैदिकविद्या महान प्रणेता चरक और महर्षि सुश्रुत तथा वाग्भट ने अपने संशोधनों से वैदिक विद्या को उच्च शिखरों तक पहुँचाया था । वैदिक विद्या और शैल्य चिकित्सा :

  • महर्षि चरक ने ‘चरक संहित’ नामक ग्रन्थ में 2000 वनस्पति औषधियों का वर्णन किया है ।
  • महर्षि सुश्रुत ने ‘सुश्रुतसंहिता’ में शैल्यचिकित्सा के धारदार साधनों का वर्णन किया था । ये साधन इतने तीक्ष्ण थे कि एक खड़े बाल को चीरकर दो भागों में बाँटते थे ।
  • वाग्भट्ट का ‘वाग्भट्टसंहिता’ का महत्त्वपूर्ण वैदिक विद्या का ग्रंथ है ।
  • प्रत्येक वैद्य के लिए ‘सुश्रुतसंहिता’, ‘चरकसंहिता’ और ‘वाग्भट्टसंहिता’ का अध्ययन करना अनिवार्य है ।
  • प्राचीन भारत के हिन्दुओं के औषधशास्त्र में खनिज, वनस्पति और प्राणियों की औषधियों का विशाल संग्रह है ।
  • दवाईयाँ बनाने की बारीक विधियों के साथ दवाओं का वर्गीकरण तथा दवाओं के उपयोग की सूचनाएँ दी गयी है ।
  • शैल्य चिकित्सा करने के लिए प्याले के आकार का पट्टा बाँधकर रक्त का परिभ्रमण रोका जाता था ।
  • पेंदु, मुत्राशय, सारगांठ, मोतिया, पथरी, हरस, टूटी-मुडी हुई हड्डीयाँ जोड़ने, शरीर में घुस गये पदार्थों को बाहर निकालने की सभी बातों में भारतीय निपुण थे ।
  • टूटे हुए नाक-कान के उपचार और ‘प्लास्टिक सर्जरी’ भी की जाती थी ।
  • मृत शरीर के चीर-फाड़ और मोम के पुतलों द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञान भी विद्यार्थियों को दिया जाता था ।
  • प्रसृति के समय जोखिमी ऑपरेशन करते थे ।
  • वे बालकों तथा स्त्री रोगों के विशेषज्ञ भी थे ।
  • रोगों के कारण, उनका निदान, रोग मिटाने के बाद परहेज भी करवाते थे ।

प्राणी चिकित्सा:

  • प्राचीन भारत में प्राणी रोगों के शास्त्रों का भी विकास हुआ था ।
  • अश्व (घोड़ा) तथा हस्ती (हाथी) के रोगों पर भी ग्रन्थ लिखे थे ।
  • इनमें ‘हस्ती आयुर्वेद’ तथा शालिहोम का अश्वशास्त्र खूब ही विख्यात है ।
  • वेदशास्त्र के विद्वान वाग्भट्ट ने निदान क्षेत्र में ‘अष्टांगहृदय’ जैसे ग्रन्थों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।

પ્રશ્ન 4.
प्राचीन भारत की विज्ञान के क्षेत्र में विरासत:
उत्तर:
भारत के प्राचीन महान ऋषियों ने विज्ञान के क्षेत्र में अमूल्य विरासत विश्व को प्रदान की है ।

  • धातुविद्या, रसायनविद्या, वैदिक विद्या, शैल्य चिकित्सा, गणितशास्त्र, खगोलशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, वास्तुशास्त्र, भौतिक शास्त्र जैसे विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में हमारे ऋषियों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, जो हमारे लिए गौरव की बात है ।
  • भारत ने विविध विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी अपना शीर्ष योगदान दिया है ।
  • अर्वाचीन युग के संशोधनों द्वारा पता चलता है कि भारत आध्यात्मिक विचार के साथ वैज्ञानिक दृष्टिबिन्दु भी रखता है ।
  • पाश्चात्य देशों की अधिकांश वैज्ञानिक और टेक्निकल खोजों से किसी भी प्रकार प्राचीन भारत के विज्ञान का तत्त्व शामिल है ।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर मुद्दासर दीजिए:

પ્રશ્ન 1.
प्राचीन भारत ने गणितशास्त्र में साधी गयी प्रगति की जानकारी दीजिए ।
उत्तर:
भारत ने गणितशास्त्र में महत्त्वपूर्ण खोजें की थी । भारत ने शून्य (0) की खोज, दशांश पद्धति, बीजगणित, बोधायन का प्रमेय, रेखागणित और वैदिक गणित जैसे खोजें दी ।

  • शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की थी । शून्य को लगाकर अंकों में उपयोग की खोज गृत्समद नामक ऋषि ने की थी ।
  • प्राचीन भारत के गणितज्ञो ने 1 (एक) के पीछे 53 (वेपन) शून्य रखने से बनती संख्या का नाम निर्धारित किया था ।
  • हड़प्पा और मोहें-जो-दड़ो के अवशेषों में मापवाले और तोलने के साधनों में ‘दशांश पद्धति’ पायी जाती है । इसकी पहचान प्राचीन समय में मेघातिथि ने दी थी ।
  • ई.स. 1150 में भास्कराचार्य ने ‘लीलावती गणित’ और ‘बीजगणित’ नामक ग्रन्थ लिख्खे । उसने + (जोड़) तथा – (घटाव) में भी संशोधन किया था ।
  • ब्रह्मगुप्त ने समीकरण के प्रकार बताये थे ।
  • बोधायन का प्रमेय (त्रिकोणमिति) आपस्तंभ ने शुल्बसूत्रों में (ई.स. 800 पूर्व) विविध वैदिक यज्ञों के लिए आवश्यक विविध वेदियों  का प्रमाण निश्चित कर सिद्धांत दिये ।
  • आर्यभट्ट के ‘आर्य भट्टीयम’ ग्रंथ में π (पाई) की कीमत 22/7 (3.14) होती है, इसका उल्लेख है । उसने प्रतिपादित किया था कि वृत्त का गुणोत्तर दर्शाने का अचलांक π है ।
  • भाग की आधुनिक पद्धतियाँ, गुणांक, जोड, वर्गमूल, घनमूल आदि की अष्टांग पद्धति की जानकारी आर्यभट्ट के ग्रंथों में दी है ।
  • आर्यभट्ट को गणितशास्त्र का पिता कहते है, उन्होंने दशगीतिका और आर्यभट्टीयम जैसे ग्रन्थ लिख्ने ।
  • आर्यसिद्धांत में ज्योतिषशास्त्र के मूल सिद्धांतों का संक्षेप में वर्णन है । बीजगणित, अंकगणित और रेखागणित की मूलभूत समस्याओं को हल किया ।
  • इसके अलावा गणित के विभिन्न पक्षों का अपने अपने ग्रंथों में बोधायन, आपस्तंभ और काव्यापन, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त ने वर्णन किया है ।

प्रश्न 2.
प्राचीन भारत का खगोलशास्त्र:
उत्तर:
शास्त्रों में सबसे प्राचीन खगोलशास्त्र है ।

  • खगोलशास्त्र से जुड़े अनेक ग्रंथ भारत में लिखे गये है, इन सभी ग्रन्थों का प्राचीन विद्यापीठों में व्यवस्थित और गहन अध्यापन करवाया जाता था ।
  • ग्रहो और उनकी गति, नक्षत्रों तथा अन्य आकाशीय पदार्थों से गणना करके खगोल और ज्योतिषशास्त्र का विकास किया गया था ।
  • ग्रहों के फल से ज्योतिष फलित हुआ है ।
  • जिसके नाम पर भारत के प्रथम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया है, उस आर्यभट्ट का खगोलशास्त्र में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है ।
  • आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है तथा चंद्रग्रहण का वास्तविक कारण पृथ्वी की परछाई है । उन्हें विद्वान ‘अजरमर’ के नाम से संबोधित करते थे ।
  • ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मसिद्धांत ग्रन्थ में गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रचलित किया था ।

પ્રશ્ન 3.
ज्योतिषशास्त्र में भारत के योगदान की जानकारी दीजिए ।
उत्तर:
ग्रहों के फल द्वारा ज्योतिष शास्त्र फलित हुआ है ।

  • ज्योतिषशास्त्र को ‘तंत्र’, ‘होरा’ और ‘संहिता’ इन तीन भागों में बाँटनेवाले वराहमिहिर महान खगोलशास्त्री तथा ज्योतिषशास्त्री थे ।
  • वराहमिहिर ने ‘बृहदसंहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की थी ।
  • इस ग्रंथ में मानव के भविष्य पर होनेवाले असर, मनुष्य के लक्षण, प्राणियों के वर्ग, विवाह समय, तालाब, कुओं, बगीचों, खेतों में बुवाई आदि प्रसंगों के शुभमूहों की जानकारी दर्शायी गयी है ।
  • हमें गर्व होता है कि हमारे पूर्वज ज्योतिष विद्या में कितने निपुण थे ।

પ્રશ્ન 4.
वास्तुशास्त्र में किस जानकारी का समावेश होता है ?
उत्तर:
वास्तुशास्त्र ज्योतिषशास्त्र का ही एक अविभाज्य अंग है, जिसकी गणना, महत्ता और प्रशंसा अनेक देशों में भी स्वीकार्य हुई है ।

  • प्राचीन भारत में ब्रह्मा, नारद, बृहस्पति, भृगु, वशिष्ट, विश्वकर्मा जैसे विद्वानों ने वास्तुशास्त्र में योगदान दिया था । .
  • वास्तुशास्त्र में रहने के स्थान, मंदिर, महल, अश्वशाला, किला, शस्त्रागार, नगर आदि की रचना किस तरह करनी, किस दिशा में करनी इसका वर्णन किया गया है । बृहदसंहिता में भी वास्तुशास्त्र का उल्लेख है ।
  • पंदरहवी सदी में मेवाड़ के राणा कुंभा ने पहले के प्रकाशनों में सुधार करवाकर वास्तुशास्त्र का पुनरुद्धार करवाया ।
  • वास्तुशास्त्र को 8 भागों में बाँटनेवाले देवों के प्रथम स्थापति विश्वकर्मा थे ।
  • वास्तुशास्त्र में स्थान की पसंदगी, विविध आकार, रचना, कद, वस्तुओं की जमावट, देवमंदिर, ब्रह्मस्थान, भोजनकक्ष, शयनरखंड आदि विविध स्थानों की जानकारी दी गयी है ।
  • वास्तुशास्त्र की दृष्टि में अब परिवर्तन आया है, जबकि अब उसे विदेशों में भी स्वीकृति मिल रही है ।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षिप्त में दीजिए:

પ્રશ્ન 1.
विज्ञान और टेक्नोलॉजी अर्थात् क्या ?
उत्तर:
विज्ञान अर्थात् व्यवस्थित ज्ञान और टेक्नोलॉजी अर्थात् विज्ञान की व्यवहारिक उपयोगिता । विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों शब्द
भिन्न होने के उपरांत जुड़ गये है ।

પ્રશ્ન 2.
रसायनविद्या के क्षेत्र में नागार्जुन द्वारा दिया गया योगदान बताइए ।
उत्तर:
रसायनशास्त्रियों में नालंदा विद्यापीठ के बोद्ध आचार्य नागार्जुन को भारतीय रसायनशास्त्र के आचार्य माना जाता है ।

  • उन्होंने ‘रसरत्नाकर’ और ‘स्वास्थ्य मंजरी’ जैसी पुस्तकें लिखी है ।
  • आचार्य नागार्जुन ने वनस्पति औषधियों के साथ-साथ रासायनिक औषधियों के उपयोग का परामर्श दिया था ।
  • पारे की भस्म का औषधि के रूप में उपयोग उसने शुरू किया था ।

પ્રશ્ન 3.
गणितशास्त्र में आर्यभट्ट द्वारा की गयी खोजों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
आर्यभट्ट ने शून्य (0) की खोज की थी इसका वर्णन उसने अपने ग्रन्थ आर्यभट्टीयम में किया है ।

  • आर्यभट्ट ने (पाई) की किमत 22/7 (3.14) होती है, जिसका उल्लेख अपने ग्रन्थ में किया है ।
  • उसने प्रतिपादित किया कि गोलक (वृत्त) की परिधि और व्यास के गुणोत्तर को दर्शाने के लिए अचलांक ए है ।
  • भाग की आधुनिक पद्धति, गुणाकार, जोड़, भाग, वर्गमूल, घनमूल आदि अष्टांग पद्धति की जानकारी आर्यभट्ट ने. अपने ग्रन्थों में दी है ।
  • इसलिए आर्यभट्ट को गणितशास्त्र का पिता कहा जाता है ।
  • उसने ‘दशगीतिका’, ‘आर्यभट्टीयम’ जैसे ग्रन्थ लिखे है ।
  • गणित, अंकगणित और रेखागणित की मूलभूत समस्याओं का समाधान खोजा है ।

પ્રશ્ન 4.
ज्योतिषशास्त्र के कितने विभाग किये गये है ? नाम लिखो ।
उत्तर:
ज्योतिषशास्त्र के तीन विभाग किये गये है ।

  1. तंत्र
  2. होरा और
  3. संहिता ।।

પ્રશ્ન 5.
वास्तुशास्त्र के प्रणेता का नाम लिखो ।
उत्तर:
प्राचीन भारत में ब्रह्मा, नारद, बृहस्पति, भृगु, वशिष्ट, विश्वकर्मा जैसे विद्वान भारतीय वास्तुशास्त्र के प्रणेता थे ।

4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर सही विकल्प चुनकर दीजिए:

પ્રશ્ન 1.
कला की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्प कौन-सी है ?
(A) बुद्ध की
(B) नटराज की
(C) बुद्धगया की
(D) धनुर्धारी राम की
उत्तर:
(B) नटराज की

પ્રશ્ન 2.
निम्न में से कौन-सा विधान सत्य नहीं है ?
(A) नागार्जुन को भारतीय रसायनशास्त्र का आचार्य माना जाता है ।
(B) पारे की भस्म करके औषधी के रूप में उपयोग की प्रथा नागार्जुन ने शुरू की ।
(C) रसायनशास्त्र में प्रयोगात्मक विज्ञान नहीं है ।
(D) धातुओं की भस्म का वर्णन रसायनशास्त्र के ग्रंथों में पाया जाता है ।
उत्तर:
(C) रसायनशास्त्र में प्रयोगात्मक विज्ञान नहीं है ।

પ્રશ્ન 3.
महर्षि चरक : चरक संहिता, महर्षि सुश्रुत : …………………..
(A) सुश्रुतसंहिता
(B) चरकशास्त्र
(C) वागभट्ट संहिता
(D) सुश्रुतशास्त्र
उत्तर:
(A) सुश्रुतसंहिता

પ્રશ્ન 4.
किसी विद्यालय में एक कक्षा के कुछ विद्यार्थी गणितशास्त्र के विषय में चर्चा करते है । इनमें से कौन सत्य बोलता है ?
श्रेया: भास्कराचार्य ने ‘लीलावती गणित’ और ‘बीजगणित’ के ग्रन्थ लिखे थे ।
यश: दशांशपद्धति के खोजकर्ता बोधायन थे ।
मानसी: आर्यभट्ट को ‘गणितशास्त्र के पिता’ के रूप में पहचाना जाता है ।
हार्द: शून्य (0) की खोज भारत ने की थी ।
(A) यश
(B) हार्द
(C) श्रेया
(D) श्रेया, मानसी, हार्द
उत्तर:
(D) श्रेया, मानसी, हार्द

પ્રશ્ન 5.
ब्राभ्रव्य पांचात रचित ग्रंथ ………………………. है ।
(A) चिकित्सासंग्रह
(B) प्रजननशास्त्र
(C) कामसूत्र
(D) यंत्र सर्वस्व
उत्तर:
(B) प्रजननशास्त्र

પ્રશ્ન 6.
प्राचीन भारत में गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रचलित करती प्रणाली ब्रह्मसिद्धांत की रचना किसने की थी ?
(A) ब्रह्मगुप्त
(B) वात्स्यायन
(C) गृत्समद
(D) महामुनि पातंजलि
उत्तर:
(A) ब्रह्मगुप्त

પ્રશ્ન 7.
मंदिर, महल, अश्वशाला, किला इत्यादि की रचना किस तरह करनी इसके सिद्धांत दर्शानेवाला शास्त्र निम्न में से कौन-सा है ?
(A) गणितशास्त्र
(B) रसायनशास्त्र
(C) वैदकशास्त्र
(D) वास्तुशास्त्र
उत्तर:
(D) वास्तुशास्त्

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